26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध के साथ शुरू होगा पितृ पक्ष, 15 दिन में पूरे होंगे 16 श्राद्ध, 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या पर समापन

उज्जैन।(स्वदेश mp न्यूज़… राजेश सिंह भदौरिया बंटी) इस वर्ष पितृ पक्ष 26 सितंबर को भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध के साथ प्रारंभ होगा। खास बात यह है कि इस बार 30 सितंबर को चतुर्थी और पंचमी तिथि एक ही दिन पड़ने का विशेष संयोग बन रहा है। इस कारण 16 श्राद्ध तिथियां 15 दिन में ही पूरी हो जाएंगी। 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृ पक्ष का समापन होगा। श्राद्ध पक्ष के दौरान धर्मनगरी उज्जैन में मोक्षदायिनी क्षिप्रा के तट और सिद्धवट पर तर्पण व पिंडदान के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचेंगे।
श्री मातंगी केंद्र के ज्योतिर्विद पं. अजय कृष्ण शंकर व्यास ने बताया कि श्राद्ध हमेशा पूर्वजों के निधन की तिथि के अनुसार किया जाता है। यदि किसी पूर्वज की मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो, तो सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध किया जाता है। इन दिनों पितरों की तृप्ति के लिए तिल व जल से तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण भोजन के साथ ही गौ, कुत्ते एवं कौवे को अन्न अर्पण करने का विधान है।
कुशा से तर्पण का है विशेष महत्व
ज्योतिर्विद पं. अजय व्यास ने बताया कि श्राद्ध कर्म में कुशा का अत्यधिक महत्व है। विधि-विधान से किए जाने वाले तर्पण में इसका प्रयोग अनिवार्य है। तर्पण के समय कुशा का आसन बिछाया जाता है और दोनों अनामिका उंगलियों में कुशा की पवित्री पहनी जाती है। देवतीर्थ से जल देते समय कुशा का अग्र भाग पूर्व दिशा में और कायतीर्थ से जल गिराते समय उत्तर दिशा में रखा जाता है। जल ऐसे गिराया जाता है कि वह अनिवार्य रूप से कुशा को छूता हुआ जाए।
अंगूठे के मूल भाग को माना गया है पितृ तीर्थ
पं. अजय व्यास ने बताया कि अग्निपुराण के अनुसार हथेली के जिस भाग पर अंगूठा स्थित होता है, उसे पितृ तीर्थ माना जाता है। अंगूठे के माध्यम से अर्पित किया गया जल पितृ तीर्थ से होता हुआ पितरों के लिए बनाए गए पिंडों तक पहुंचता है। इससे पितृ प्रसन्न होते हैं और उन्हें शांति मिलती है। वहीं, पौराणिक कथाओं के अनुसार प्रजापति दक्ष की पुत्री स्वधा पितृगण की पत्नी थीं। पितरों को हवि देते समय ‘स्वधा’ का विशेष रूप से उच्चारण किया जाता है।
यह रहेगा श्राद्ध तिथियों का क्रम
पं. व्यास ने बताया कि श्राद्ध तिथियों के अनुसार 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध, 27 को प्रतिपदा, 28 को द्वितीया और 29 को तृतीया तिथि का श्राद्ध होगा। 30 सितंबर को चतुर्थी व पंचमी तिथि का श्राद्ध एक साथ किया जाएगा। इसी प्रकार 1 अक्टूबर को षष्ठी, 2 को सप्तमी, 3 को अष्टमी, 4 को नवमी व मातृ नवमी, 5 को दशमी, 6 को एकादशी, 7 को द्वादशी व मघा श्राद्ध, 8 को त्रयोदशी, 9 को चतुर्दशी तथा 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध संपन्न होगा।