दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस दिन देशभर में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है। हालांकि, सांगोला में इस अवसर पर रावण का पुतला जलाने के बजाय विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। ग्रामीणों के लिए यह दिन अपनी पारंपरिक आस्था को दोहराने और सामूहिक रूप से धार्मिक आयोजन में भाग लेने का अवसर होता है।
गांव में रावण की पूजा केवल दशहरे तक सीमित नहीं है। यहां स्थापित दशमुखी प्रतिमा की सालभर नियमित रूप से आराधना की जाती है। महिलाएं भी इस धार्मिक परंपरा में हिस्सा लेती हैं। ग्रामीणों का विश्वास है कि रावण महाराज उनके गांव की रक्षा करते हैं और उनकी कृपा से क्षेत्र में सुख-समृद्धि बनी रहती है। इसी आस्था के कारण यहां रावण को सामान्य रूप से प्रचलित खलनायक की छवि से अलग, पूजनीय स्वरूप में देखा जाता है।
स्थानीय मान्यता के मुताबिक, इस परंपरा की शुरुआत एक ऋषि महाराज से जुड़ी है, जो कभी गांव में रहा करते थे। ग्रामीण उन्हें श्रद्धा की दृष्टि से देखते थे। बताया जाता है कि अपने अंतिम समय में ऋषि महाराज ने ऐसी प्रतिमा स्थापित करने की बात कही थी, जिसमें दस बिंदु या चिह्न हों। इसके बाद प्रतिमा बनाने की जिम्मेदारी मूर्तिकार को दी गई।
मान्यता के अनुसार, मूर्तिकार ने दस बिंदुओं वाली प्रतिमा बनाने के बजाय दस मुखों वाली मूर्ति तैयार कर दी। इसका स्वरूप रावण से मिलता-जुलता था। जब प्रतिमा को बैलगाड़ी से गांव लाया जा रहा था, तब बैलगाड़ी गांव की सीमा पार नहीं कर सकी। ग्रामीणों ने इस घटना को दैवी संकेत माना और प्रतिमा को उसी स्थान पर स्थापित कर दिया। इसके बाद से दस सिरों वाले रावण को ग्राम देवता के रूप में पूजने की परंपरा शुरू होने की बात कही जाती है। यह विवरण स्थानीय लोकविश्वास पर आधारित है, जिसे पीढ़ियों से आगे बढ़ाया जा रहा है।
रावण के भक्त ज्ञानेश्वर महाराज धाकरे के अनुसार, गांव में उनकी पूजा का उद्देश्य रावण के चरित्र के प्रत्येक पहलू का समर्थन करना नहीं है। उनके मुताबिक, इस आराधना के पीछे भगवान शिव के प्रति रावण की भक्ति, साधना और समर्पण के प्रति सम्मान की भावना है। उनका कहना है कि रावण सोने की लंका का राजा था और ग्रामीणों का विश्वास है कि उसकी पूजा से उनका गांव भी सोने की लंका की तरह सुखी और समृद्ध बना है।
ग्रामीण अपनी खुशहाली और सुरक्षा की भावना को रावण महाराज की कृपा से जोड़ते हैं। उनका मानना है कि इस परंपरा के चलते गांव में सुख-समृद्धि बनी रहती है और संकटों से रक्षा होती है। दशहरे पर होने वाला सामूहिक पूजन इसी विश्वास का प्रमुख हिस्सा है।
