गणेश विसर्जन से रावण दहन तक पर उठाए सवाल, शास्त्रों के अनुसार धार्मिक परंपराओं के पालन की मांग, अखाड़ा पुजारी महासंघ ने संतों को लिखा पत्र

उज्जैन।(स्वदेश mp न्यूज़… राजेश सिंह भदौरिया बंटी) अखिल भारतीय पुजारी महासंघ ने सनातन धर्म में आ रही विकृतियों और मनमानी परंपराओं को लेकर अखाड़ा परिषद और अखिल भारतीय संत समिति पर कड़े सवाल दागे हैं। महासंघ ने गणेश और दुर्गा विसर्जन की तिथियों में बदलाव के साथ ही रावण दहन की सत्यता पर सवाल उठाते हुए अखाड़ा परिषद अध्यक्ष श्री रविन्द्रपुरी महाराज और संत समिति के महामंत्री जितेन्द्रानंद सरस्वती को पत्र लिखा है।
पुजारी महासंघ के राष्ट्रीय सचिव रूपेश मेहता ने बताया कि सनातन धर्म शास्त्र प्रधान है लोक प्रधान नहीं। वर्तमान में लोगों संस्थाओं और संतों ने धर्म और शास्त्र की मर्यादाओं को अपने अनुसार ढाल लिया है। हमारे सभी त्यौहार और उत्सव शास्त्र सम्मत मर्यादा से बंधे हैं लेकिन आज धर्म को विकृत किया जा रहा है जिसमें सुधार की अति आवश्यकता है।
विसर्जन की तिथियों और रावण दहन पर आपत्ति
रूपेश मेहता ने कहा कि धर्मसिंधु के प्रमाण अनुसार गणेश विसर्जन अनंत चतुर्दशी को होना चाहिए लेकिन अज्ञानतावश पूर्णिमा तक गणपति को सड़कों पर घुमाया जाता है। इसी तरह नवरात्रि में माताजी का विसर्जन दशमी के बजाय शरद पूर्णिमा तक रोककर डीजे पर अश्लील गानों के साथ किया जा रहा है। उन्होंने रावण दहन को सबसे बड़ा झूठ बताते हुए कहा कि किसी भी वेद पुराण या वाल्मीकि रामायण में रावण दहन का प्रमाण नहीं है। भगवान राम ने रावण का वध किया था और उसका अंतिम संस्कार विभीषण ने लंका में विधि-विधान से किया था।
संतों की चुप्पी और विजन पर सीधे सवाल
महासंघ ने श्री रविन्द्रपुरी महाराज और जितेन्द्रानंद सरस्वती से सीधा सवाल किया है कि वे सनातन के रक्षक होने के नाते इन विकृतियों को रोकने के लिए पहल कब करेंगे। संसद में राहुल गांधी और पप्पू यादव के नाटक मंचन को सनातन का अपमान बताने वाले संत इन ज्वलंत मुद्दों पर चुप क्यों हैं। महासंघ ने पूछा है कि रावण दहन शास्त्र सम्मत है या पाखंड। साथ ही सनातन को बचाने का ठेका लेने वाले मठाधीशों और संतों का धर्म के प्रति क्या विजन है यह देश को बताना चाहिए।
शास्त्रों को अपने हिसाब से चलाएंगे तो आसाराम और ज्ञानदास जैसे बाबा पैदा होंगे
रूपेश मेहता ने स्पष्ट किया कि यदि संत शास्त्रों के अनुसार चलेंगे तो नीम करोली बाबा जैसे संत पैदा होंगे। इसके उलट यदि वे शास्त्रों को अपने हिसाब से चलाएंगे तो आसाराम और ज्ञानदास जैसे बाबा पैदा होंगे। सनातन को बचाने के लिए शास्त्र को ही आचार्य मानना होगा।
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