उज्जैन।(स्वदेश mp न्यूज़… राजेश सिंह भदौरिया बंटी) श्रावण-भादौ मास में निकलने वाली भगवान श्री महाकालेश्वर की सवारी में इस वर्ष भी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का अनूठा संगम देखने को मिलेगा। सनातन संस्कृति और प्राचीन काल के राजा-महाराजाओं की वेशभूषा का प्रदर्शन करते हुए ‘मुस्कुराके मंडली’ इस वर्ष 39वें साल सवारी में शामिल होगी। मंडली के सदस्य विभिन्न राज्यों की सांस्कृतिक राजसी वेशभूषा और विशेष पगड़ियों के साथ राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा लेकर चलेंगे।
देशभर की राजसी वेशभूषा और विशेष पगड़ियां
स्वामी मुस्कुराके शैलेंद्र व्यास ने बताया कि इस वर्ष सवारी में दक्षिण भारतीय शैली सहित गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक, उड़ीसा, असम और केरल की पारंपरिक राजसी वेशभूषा का प्रदर्शन किया जाएगा। युवाओं को सनातन संस्कृति से जोड़ने के इस प्रयास में इस वर्ष सिंहस्थ महाकुंभ की पगड़ी, शौर्य का सिंदूर, चंद्रयान, ब्रह्मोस मिसाइल पगड़ी, तिरंगा पगड़ी, सूर्ययान, त्रिशूल पगड़ी और मयूर मुकुट विशेष आकर्षण का केंद्र रहेंगे। इस सांस्कृतिक अनुष्ठान में स्वामी खिलखिलाके मनोहर गुप्ता (नायक), स्वामी दिल मिलाके पंडित दिनेश रावल, स्वामी गुदगुदाके मोहित गहलोत और पप्पू तलवार राजसी वेशभूषा में नटराज बाबा महाकाल की आराधना करते हुए चलेंगे।
राजा भोज ने दिया था राजकीय उत्सव का स्वरूप
श्रीमहाकालेश्वर की सवारी का उल्लेख 11वीं शताब्दी की पांडुलिपियों में मिलता है। परमार वंश के महान शासक राजा भोज ने इस सवारी को राजकीय उत्सव का स्वरूप प्रदान किया था। उस दौरान लोक कलाकार, संगीतकार और करतब दिखाने वाले नट सवारी का हिस्सा होते थे। राजा भोज स्वयं अपनी सेना और लाव-लश्कर के साथ पालकी के आगे चलते थे।
मराठा काल में मिला नवजीवन
मराठा शासनकाल में सिंधिया वंश के राणोजी सिंधिया ने श्री महाकाल मंदिर के जीर्णोद्धार के साथ-साथ सवारी परंपरा को भी नवजीवन दिया। उन्होंने सवारी में रथ, गजराज, सजीव लोक परंपराओं और राजसी वेशभूषा का बेजोड़ प्रदर्शन शामिल किया, जिसकी झलक आज भी सवारी में देखने को मिलती है। इसी पुरातन परंपरा को मुस्कुराके मंडली विगत 38 वर्षों से सहेजते हुए सवारी को भव्यता प्रदान कर रही है।
