ईटी की रिपोर्ट के मुताबिक, इस कदम का मकसद LPG बचाना है, साथ ही ज्यादा से ज्यादा घरों तक सप्लाई बनाए रखना है. कंपनियों के अनुमान के मुताबिक, एक औसत घर में 14.2 किलोग्राम का एक स्टैंडर्ड सिलेंडर 35-40 दिन चलता है. 10 किलोग्राम का रिफिल एक घर के लिए लगभग एक महीने तक चल सकता है, जिससे कमी के समय उपलब्ध मात्रा को ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सकेगा.
रिपोर्ट के मुताबिक, अगर इसे लागू किया जाता है, तो सिलेंडरों पर एक नया स्टिकर लगा होगा जो कम मात्रा को दिखाएगा और कीमतें भी उसी हिसाब से कम कर दी जाएंगी. बॉटलिंग प्लांटों को अपने वजन मापने वाले सिस्टम को फिर से सेट करना होगा और कुछ सरकारी मंजूरी की भी जरूरत पड़ सकती है. कंपनियों को चिंता है कि अचानक कमी से भ्रम, विरोध प्रदर्शन और राजनीतिक विरोध हो सकता है. खासकर तब जब राज्यों के अहम चुनाव नजदीक आ रहे हैं. हालांकि, अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि अगले महीने सप्लाई की स्थिति और खराब हो सकती है, जिससे विकल्प सीमित रह जाएंगे. LPG की उपलब्धता कम होती जा रही है.
भारत की रोजाना की 93,500 टन LPG खपत में से घरों में 80,400 टन, यानी 86% की खपत होती है. मार्च के पहले पखवाड़े में कुल खपत में 17% की गिरावट आई, जिससे पता चलता है कि इसका असर कमर्शियल और औद्योगिक इस्तेमाल करने वालों से आगे भी पड़ा है. भारत अपनी LPG की जरूरत का 60% इंपोर्ट करता है और संघर्ष से पहले खाड़ी देशों से 90% सप्लाई आती थी. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने धमकी दी है कि अगर होर्मुज स्ट्रेट जहाजों के लिए बंद रहता है, तो वह ईरान के पावर प्लांटों को तबाह कर देंगे.
